मैंने समन्दर नहीं देखा
सपनों को मैंने कभी बुनकर नहीं देखा,
सोचता हूँ रोज़ सोने से पहले मैंने समन्दर नहीं देखा ।
उठती हुई लहरों को,
कोने पर लगते मेलों को,
मैंने कभी नजदीक से नहीं देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
रोज़ सोचता हुँ की कोशिश करुँगा,
खुद को बदलने कि वसीहत करुँगा,
मैंने खुदकों बदलते नहीं देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
देखी मैंने भी है नदियाँ कई,
माँ गंगा, यमुना, गोदावरी कई,
मैंने उनको जीवन देते हुये देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
ऐसा नहीं है कि देवानगी है,
खुद पर मर-मिटने कि परवानगी है,
मैंने खुदकों खुदसे लड़ते नहीं देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
याद कारता हुँ अपने बचपन को,
होती गलतियाँ लगती मार को,
अबतों मैंने किसीको डाटते नहीं देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
बदल रही है मात्तभूमि मे रोनक,
टूट गयी हैअपनत्व कि रोनक,
मैंने लोगो को अब प्रेम करते नहीं देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
सोचता हुँ मे उन सभ मौसम को,
जो आये जीवन मे सावन को,
सासों कि लहरों का पार नहीं मैंने देखा,
लोग कहते है अच्छा हुआ मैंने समन्दर नहीं देखा।
सोचता हूँ रोज़ सोने से पहले मैंने समन्दर नहीं देखा ।
उठती हुई लहरों को,
कोने पर लगते मेलों को,
मैंने कभी नजदीक से नहीं देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
रोज़ सोचता हुँ की कोशिश करुँगा,
खुद को बदलने कि वसीहत करुँगा,
मैंने खुदकों बदलते नहीं देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
देखी मैंने भी है नदियाँ कई,
माँ गंगा, यमुना, गोदावरी कई,
मैंने उनको जीवन देते हुये देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
ऐसा नहीं है कि देवानगी है,
खुद पर मर-मिटने कि परवानगी है,
मैंने खुदकों खुदसे लड़ते नहीं देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
याद कारता हुँ अपने बचपन को,
होती गलतियाँ लगती मार को,
अबतों मैंने किसीको डाटते नहीं देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
बदल रही है मात्तभूमि मे रोनक,
टूट गयी हैअपनत्व कि रोनक,
मैंने लोगो को अब प्रेम करते नहीं देखा,
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
सोचता हुँ मे उन सभ मौसम को,
जो आये जीवन मे सावन को,
सासों कि लहरों का पार नहीं मैंने देखा,
लोग कहते है अच्छा हुआ मैंने समन्दर नहीं देखा।